कृषि उद्यमिता से ग्रामीण भारत में आजीविका सुरक्षा


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Authors

  • रवींद्र नाथ पडारिया भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • स्वीटी मुखर्जी भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • सिमरन पुंडीर भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • ऐश्वर्या एस. भाकृअनुप-केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान, हिसार
  • प्रीति प्रियदर्शिनी बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर

Abstract

ग्रामीण भारत आज तीव्र सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। एक समय था, जब कृषि को ग्रामीण परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार माना जाता था, किंतु वर्तमान परिस्थितियों में यह किसानों और उनके परिवारों की बढ़ती आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं रह गई है। भूमि पर बढ़ते जनसंख्या दबाव, कृषि उत्पादन की बढ़ती लागत, बाजार मूल्यों में निरंतर उतार-चढ़ाव तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए पारंपरिक खेती की
लाभप्रदता को कम कर दिया है। दूसरी ओर तकनीकी प्रगति, बेहतर संचार एवं संपर्क सुविधाएं, डिजिटल मंचों का विस्तार तथा बाजारों तक बढ़ती पहुंच ने ग्रामीण क्षेत्रों में आय अर्जित करने के नए अवसर उपलब्ध करवाए हैं। आज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है। बागवानी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि पर्यटन, नर्सरी प्रबंधन, कृषि यंत्र किराया सेवाएं तथा डिजिटल परामर्श सेवाएं ग्रामीण आय के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर रही हैं। गुणवत्तापूर्ण खाद्य
उत्पादों, प्रसंस्करित वस्तुओं तथा विशिष्ट कृषि सेवाओं की बढ़ती मांग ने नवाचार अपनाने और नए उद्यम स्थापित करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए अनेक संभावनाएं उत्पन्न की हैं। परिणामस्वरूप, आजीविका मात्रा के लिए की जाने वाली कृषि से उद्यमोन्मुख कृषि एवं ग्रामीण उद्यमिता की ओर ध्यान निरंतर बढ़ रहा है।

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Submitted

2026-08-13

Published

2026-08-13

How to Cite

रवींद्र नाथ पडारिया, स्वीटी मुखर्जी, सिमरन पुंडीर, ऐश्वर्या एस., & प्रीति प्रियदर्शिनी. (2026). कृषि उद्यमिता से ग्रामीण भारत में आजीविका सुरक्षा. खेती, 79(4), 4-10. http://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/2205