गुणों से भरपूर खाद्य पादप-पेहटा
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Abstract
झारखंड में अनेक ऐसे पौधे पाए जाते हैं, जो आदिवासी जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। पेहटा झारखंड की पठारी भूमि और वनवासी जीवनशैली में पाया जाने वाला ऐसा ही एक
पफल है, जो स्वतः उगता है और आदिवासी समाज के प्रकृति से गहरे जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। इसे न तो बड़े खेतों में उगाया जाता है और न ही यह बाजारों में बड़ी मात्रा में
उपलब्ध होता है, फिर भी यह ग्रामीण जीवन, पारंपरिक रसोई और लोक चिकित्सा में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे चिब्बर, कचरी, जंगली खरबूजा, मस्क
मेलन तथा छोटी लौकी जैसे नामों से जाना जाता है। वैज्ञानिक रूप से कुकुमिस मेलो वेराइटी एग्रेटिस कहलाने वाला यह जंगली खररबूजा सामान्यतः उपेक्षित रहता है, लेकिन आदिवासी समुदायों के लिए यह प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है। पेहटा आदिवासी जीवन में केवल एक खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। गर्मियों के मौसम में, जब हरी सब्जियों की उपलब्ध्ता कम हो जाती है, तब पेहटा ग्रामीण रसोई का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। यह न केवल पोषण का स्रोत है, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा, सांस्कृतिक अनुष्ठानों और सतत कृषि प्रणाली की एक अहम कड़ी भी है।
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