कृषि विज्ञान केंद्रों की पांच दशकों की गौरवशाली यात्रा
135 / 63सार
कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) ने भारत के कृषि परिदृश्य में अग्रणी विस्तार प्रणाली के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये जिला-स्तरीय संस्थान, भारतीय कृषि के प्रक्षेप पथ को आकार देने, नवाचार को आगे बढ़ाने और वैज्ञानिक ज्ञान एवं तकनीकों के साथ किसानों को सशक्त बनाने में सहायक रहे हैं। केवीके की यात्रा डा. मोहन सिंह मेहता समिति की रिपोर्ट की संस्तुतियों के पफलस्वरूप 21 मार्च, 1974 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) द्वारा पुड्डुचेरी (पूर्व में पांडिचेरी) में पहले केवीके की स्थापना के साथ शुरू हुई। तब से, केवीके ने देशभर में कृषि पक्तियों को बदलने और नवाचार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। योजना आयोग ने देश में अधिक केवीके स्थापित करने की विभिन्न क्षेत्रों से आ रही लोगों की मांग को ध्यान में रखते हुए छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान 44 नए केवीके स्थापित करने की भाकृअनुप की योजना को अनुमति दी। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय कृषि आयोग (वर्ष 1976) ने ‘अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार’ पर अपनी रिपोर्ट में संस्तुति की कि प्रत्येक जिले के लिए एक केवीके और अंततः प्रत्येक जिले के लिए तीन केवीके स्थापित करने की योजना होनी चाहिए।
##plugins.themes.default.displayStats.downloads##
##submission.downloads##
प्रकाशित
अंक
खंड
##submission.license##
##submission.copyrightStatement##
##submission.license.cc.by-nc-sa4.footer##खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।