नाडेप पद्धति से कृषि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन

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लेखक

  • तेजस्विनी कपिल डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)
  • अरविन्द कुमार सिंह डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)
  • आनंद कुमार डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)
  • अंशु गंगवार डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)
  • प्रज्ञा भदौरिया डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)
  • अंजनी कुमार डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (बिहार)

सार

खाद को सदियों से एक मूल्यवान मृदा संशोधन माना जाता रहा है। खाद का उपयोग स्वस्थ पौधों के उत्पादन को बढ़ाने, पैसे बचाने, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का एक प्रभावी तरीका है। खाद एक स्थिर कार्बनिक पदार्थ प्रदान करता है, जो मृदा के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार करता है। इससे मृदा की गुणवत्ता और पफसल उत्पादन के साथ-साथ टिकाऊ आधार पर कृषि उत्पादकता में वृद्धि होती है।

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प्रकाशित

2024-04-09