गोबर खाद का वैज्ञानिक उत्पादन

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लेखक

  • राजेश कथवाल क्षेत्राीय अनुसंधान केन्द्र (बागवानी), बुरिया, यमुनानगर-135101 (हरियाणा)
  • कृष्ण भारद्वाज चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार-125004 (हरियाणा)

सार

रासायनिक खादों के अनावश्यक और अत्यधिक प्रयोग से मृदा की उर्वराशक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके कारण मृदा में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त रासायनिक खादों का मूल्य भी अधिक होने के कारण किसानों को खाद्यान्न उत्पादन पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। इसके विपरीत गोबर की खाद जिसे ‘फार्म यार्ड मैन्योर’ भी कहा जाता है। यह गोबर, पशुओं के मूत्रा, छोड़ा हुआ तूड़ा इत्यादि के सही गलने और सड़ने से बनती है। सस्ती होने के साथ-साथ यह मृदा में सभी प्रकार के मुख्य पोषक तत्वों जैसे-नाइट्रोजन, फाॅस्पफोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्पफर व सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे-आयरन, मैंग्नीज, काॅपर और जिंक, पौधों की बृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं आदि भी प्रदान करती है। यह भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं में भी इजापफा करती है। यह मृदा की जल-धारण क्षमता को भी बढ़ाती है।

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प्रकाशित

2024-06-19