प्राकृतिक खेती से सतत कृषि विकास

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लेखक

  • निदा पटेल कृषि विज्ञान संकुल काष्टी, मालेगांव (महाराष्ट्र)
  • माधुरी चैरे कृषि विज्ञान संकुल काष्टी, मालेगांव (महाराष्ट्र)
  • पंकज सूर्यवंशी कृषि विज्ञान संकुल काष्टी, मालेगांव (महाराष्ट्र)

सार

पिछले कई वर्षों से खेती में हानिकारक कीटनाशकों का लगातार उपयोग किया जा रहा है। इससे कृषि में लागत बढ़ रही है और मृदा के प्राकृतिक स्वरूप में भी नुकसानदायक बदलाव हो रहे हैं। रासायनिक खेती से प्रकृति और मनुष्य के स्वास्थ्य में कापफी गिरावट आई है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते हैं। इसके सेवन से हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। इनके उपयोग से मृदा की उर्वराशक्ति प्रभावित हो रही है। इससे मृदा के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। मृदा की इस घटती उर्वरा क्षमता को देखते हुए जैविक खाद का उपयोग जरूरी हो गया है।

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प्रकाशित

2024-06-19

अंक

खंड

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