मई के मुख्य कृषि कार्य

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लेखक

  • राजीव कुमार सिंह भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012
  • कपिला शेखावत भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012
  • प्रवीण कुमार उपाध्याय भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012
  • एस.एस. राठौर भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012
  • तन्मय दास भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012

सार

मई माह जिसे वैशाख-ज्येष्ठ भी कहते हैं, में ग्रीष्म ऋतु का आगमन भी होता है। पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों का अमूल्य योगदान रहा है। इन प्राकृतिक संसाधनों में मुख्य रूप से मृदा, जल, वायु और प्रकाश शामिल हैं। कृषि उत्पादन के लिए ये संसाधन अपरिहार्य हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों में शामिल कृषि के लिए उपलब्ध जल की यदि बात करें, तो इसकी उपलब्धता एवं गुणवत्ता में कमी आ रही है। आने वाले समय में विभिन्न पफसलों को जल की कमी के साथ-साथ कुछ अन्य जैविक तनाव (बैक्टीरिया, वायरस, कवक, परजीवी, लाभकारी व हानिकारक कीट और खरपतवार) एवं अजैविक तनाव (अत्यधिक तापमान, धूप, हवा, लवणता, बाढ़, सूखा, खनिज विषाक्तता फसल, उपज और बीज की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव) का सामना करना होगा। पफसलों पर इस प्रकार के तनावों के कुप्रभाव को कम करने के लिए फसलों की नई एवं उन्नत प्रजातियों का चयन आवश्यक होगा। पफसल विविधीकरण इस प्रकार किया जाए कि पफसल उत्पादन में जैविक एवं अजैविक तनावों का सामना सरलता से किया जा सके। संसाधनों के संरक्षण के लिए संरक्षण कृषि, भूमि समतलीकरण, क्यारी रोपण, सतही बुआई, सूक्ष्म सिंचाई, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन, समेकित रोग, कीट, खरपतवार एवं पोषक तत्व प्रबंधन आदि पर बल देने की आवश्यकता होगी। इस दिशा में फसल उत्पादन की नई-नई पक्तियों जैसे-धान की सीधी बिजाई को अपनाकर जल, श्रम और समय की बचत की जा सकती है। इसे अपनाकर आय में वृद्धि के साथ-साथ जल की बचत और भूमि को संरक्षित भी किया जा सकता है। 

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प्रकाशित

2024-06-19

अंक

खंड

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