कृषि में भूस्थानिक प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता

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लेखक

  • Dr Mujahida Sayyed College of Agriculture, JNKVV, ganjBasoda Distt. Vidisha-464221 M.P.

सार

प्रकृति ने अपनी उदारता से मनुष्य को विविध आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये विभिन्न साधनों का नि:शुल्क उपहार दिया है। प्राकृतिक परिवेश से मनुष्य को विभिन्न उपयोगों के लिये प्राप्त इन प्राकृतिक नि:शुल्क उपहारों को प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। इन प्राकृतिक संसाधनों को जितनी कुशलता से प्रयोग योग्य वस्तुओं एवं सेवाओं में परिवर्तित कर लिया जाये, उतने ही श्रेयष्कर रूप में व्यक्ति की भोजन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा, यातायात एवं सांसारिक आवश्यकताएँ पूरी हो सकती है| विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों द्वारा उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को वस्तुओं और सेवाओं में अधिक कुशलता पूर्वक परिवर्तित किया जा सकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सहायता से उत्पादन में विविधीकरण किया जा सकता है, प्रयोग योग्य नवीन वस्तुओं का सृजन किया जा सकता है और जीवन-यापन को अधिक सुविधापूर्ण और सरल बनाने के लिये प्रकृति की गर्त में निहित संसाधनों की खोज की जा सकती है। अत: यह कहा जा सकता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विविध उत्पादक क्षेत्रों जैसे कृषि एवं संबंद्ध क्रियायें निर्माण, विनिर्माण सेवाओं के उत्पादन को अधिक सक्षमता के साथ बढ़ा सकता है।पहले जनसंख्या कम थी इसलिये संसाधनों पर दबाव भी अत्यंत कम था, क्योंकि सामाजिक आवश्यकताएँ सुगमता से पूरी हो जाती थी। वर्तमान स्थिति अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण है। वर्तमान समय में जनसंख्या बढ़ी है, लोगों की आय भी बढ़ी है, उपभोग प्रवृत्ति बढ़ी है, उपभोग की संरचना में परिवर्तन हुआ है, जबकि संसाधनों की मात्रा में तदनुसार परिवर्तन नहीं हुआ, अत: विद्यमान संसाधनों से ही अब अधिक जनसंख्या की बढ़ी हुई आवश्यकताओं को पूरा करना है। इस वर्तमान सामाजिक संदर्भ में सामाजिक साध्यों को पूरा करने के लिये साधनों के कुशलतम प्रयोग की आवश्यकता है और इसके लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है। प्रत्येक किसान को अपने क्षेत्र में सबसे उपयुक्त उर्वरक और सामरिक सामग्री के सही अनुपात की लगातार आवश्यकता होती है।दुर्भाग्यवश, हर क्षेत्र में मिट्टी का अनुवांशिक रूप से परिवर्तन है इसलिए क्षेत्र में हर जगह के लिए कोई विशेष पूर्वक उर्वरक काम नहीं करता है इसके अलावा, उर्वरक बहुत महंगा है और इसका दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। अतः सही उर्वरक और उसके सही अनुपात को कैसे निर्धारित किया जाए यह तय करने में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी काम में आ सकती है । भू-स्थानिक खेती की सहायता से बड़े पैमाने पर खेती को प्रभावी ढंग से तीव्र किया जा सकता है। एक खरपतवार उपद्रव का स्तर, उपलब्ध मिट्टी में नमी ,बीज दर, उर्वरक आवश्यकताओ और अन्य आवश्यक कारको के आधार पर उच्च फसल उपज का उत्पादन कर सकते हैं।

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प्रकाशित

2026-04-13