लवणीय, क्षारीय एवं अम्लीय मृदा में हरा चारा उत्पादन
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लवणीय एवं क्षारीय##common.commaListSeparator## चारा उत्पादनसार
पशुधन कृषि और देश के सकल घरेलू उत्पाद के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । कृषि और पशुधन विकास एक-दूसरे पर निर्भर होने के कारण किसी एक का विकास संभव नहीं है। गुणवत्ता युक्त हरे चारे का अभाव पशुधन विकास, गुणवत्ता युक्त दूध और मांस उत्पादन में प्रमुख बाधा है। दूध उत्पादन की लागत को काफी कम किया जा सकता है यदि हरे चारे पर आधारित फसल प्रणाली को अपनाकर हरे चारे का उत्पादन किया जाए और पशुओं को निरंतर खिलाया जाए। वर्तमान में देश लगभग 4.5 प्रतिशत (लगभग 8.6 मिलियन हेक्टेयर) भूमि पर हरे चारे का उत्पादन किया जाता है परंतु यह जरूरत के हिसाब काफी कम है। चारा फसलों के रकबे में और वृद्धि संभव नहीं होने के कारण विभिन्न प्रकार की कृषि योग्य भूमि को प्रयोग में लाया जाए जैसे-लवणीय क्षारीय एवं अम्लीय मृदा आदि। चारे का उत्पादन बढ़ाने और बर्ष भर हरे चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए प्रति इकाई भूमि क्षेत्र में उत्पादकता को बढ़ाया जाए या सभी प्रकार मृदा इसकी खेती की जाए। फसल विविधीकरण को लवणीय क्षारीय एवं अम्लीय मृदा में अपनाकर भी बर्ष भर हरे चारे का उत्पादन किया जा सकता है । देश में लगभग 6.74 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल नमक प्रभावित है। अनुमानता हर साल लगभग 10% भूमि लवणीय हो जाती है और 2050 तक, कृषि योग्य भूमि का लगभग 50% लवणीय क्षारीय मृदा में परिवर्तित हो जाएगी। ऐसी मृदा जिनमें नमक की मात्रा असामान्य रूप से अधिक होती है, जो फसल उत्पादन को प्रभावित करती करती हैं, सामूहिक रूप से नमक प्रभावित मृदा कहलाती हैं। नमक प्रभावित मृदा में फसल उत्पादन में होने वाली समस्या निम्न बातों पर निर्भर करती है जैसे नमक घटकों की मात्रा, मृदा की बनावट और मृदा प्रोफाइल में नमक, मृदा में उगाई गई फसल, मृदा-जल-फसल प्रबंधन और जलवायु आदि। चारा फसलों और घास को खाद्य फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम खाद, सिंचाई की जरूरत पढ़ती है और ज्यादा प्रबंधन की भी आवश्यकता नहीं होती। लवणीय क्षारीय एवं अम्लीय मृदा को सफलतापूर्वक चारा उत्पादन में उपयोग किया जा सकता है और यह आर्थिक रूप से भी किसानो को फायदेमंद साबित होगा।
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