भारत के हिमालयी क्षेत्रों में कृषि और पारिस्थितिकी में सतत विकास की संभावनाएँ

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लेखक

  • Sumit gaur Sumit gaur GBPUA&T

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बायोचार उत्पादन##common.commaListSeparator## कृषि व पारिस्थितिकी ##common.commaListSeparator## एकीकृत फसल प्रणाली

सार

भारत के उत्तर और उत्तर-पूर्वी हिमालयी क्षेत्र, जिनमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम सम्मिलित हैं जो देश की कृषि व पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, जल संसाधनों का दोहन, मृदा उर्वरता में गिरावट, वनों की कटाई तथा फसल अवशेष प्रबंधन की कमी जैसी चुनौतियाँ इन क्षेत्रों की कृषि को प्रभावित कर रही हैं। पारंपरिक एकल फसल प्रणाली न केवल किसानों की आय को सीमित करती है बल्कि फसल विफलता और पर्यावरणीय प्रदूषण का खतरा भी बढ़ाती है। इस अध्ययन में हिमालयी क्षेत्र को ऊँचाई के आधार पर निचले (600-1200 मी.), मध्य (1200-1800 मी.) और उच्च हिमालय (1800-3500 मी.) में विभाजित कर प्रत्येक जोन के संसाधन, समस्याएँ और उनके समाधान पर चर्चा की गई है। निचले हिमालय क्षेत्र में फसल अवशेषों से बायोचार उत्पादन, एकीकृत फसल प्रणाली और वैकल्पिक आय स्रोतों से लाभवृद्धि की संभावना है। मध्य हिमालय में सीमित जल संसाधनों के बीच बागवानी, औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती से स्थिर आय प्राप्त हो सकती है। उच्च हिमालय में कठोर जलवायु के अनुरूप ऊनी पशुपालन, केसर, जैविक चाय और औषधीय फसलों की खेती अधिक लाभकारी है। निष्कर्षतः, पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में एकीकृत कृषि प्रणाली किसानों की आय को 2 से 5 गुना तक बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता और सतत विकास को भी प्रोत्साहित करती है।

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प्रकाशित

2026-03-18