धान-परती भूमि के लिए अलसी की खेती
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तिलहन छेत्र हमारे देश की कृषि अर्थव्यवस्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्तमान में, वैश्विक स्तर पर भारत, खाद्य तेल के आयात, उत्पादन और खपत के मामले में क्रमशः दूसरे, तीसरे एवं चैथे स्थान पर है। खाद्य तिलहनों की आपूर्ति और मांग में व्यापक अंतर है और यह आयात पर बढ़ती निर्भरता में योगदान देता है। भारत में वर्ष 2018-19 में तिलहन का उत्पादन 31.5 मिलियन मीट्रिक टन था और उत्पादन में घरेलू कमी के कारण 15.6 मिलियन मीट्रिक टन खाद्य तेलों का आयात किया गया था। आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए तिलहन का उत्पादन स्थायी उपायों को अपनाकर बढ़ाना होगा। इस संदर्भ में, धान-परती वाले क्षेत्रा, जो सर्दियों के मौसम में बिना फसल के रह जाते हैं, फसल गहनता के माध्यम से अवसर प्रदान करते हैं। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में देश के कुल धान-परती क्षेत्रा (11.7 मीट्रिक हैक्टर) का 84 प्रतिशत हिस्सा है। इससे बचने के लिए अलसी की शुद्ध, शून्य जुताई या पैरा/उतेरा से खेती करके तिलहन के उत्पादन को बढ़ा सकते हैं।
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