भारत में कृषि-ऊष्मायन केंद्र: अन्नदाता के सशक्तिकरण का नया युग
53 / 90##semicolon##
कृषि-ऊष्मायन केंद्र, कृषि-उद्यमिता , अन्नदाता सशक्तिकरणसार
‘‘भारत के आर्थिक और भौगोलिक परिदृश्य में कृषि एक आधारभूत स्तंभ है, जो न केवल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत भी है। देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद, भारतीय कृषि क्षेत्र एक गहरे संरचनात्मक विरोधाभास का सामना कर रहा है। सांख्यिकीय आंकड़ों में कृषि उत्पादन नई ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन वास्तविक उत्पादक यानी किसानों की व्यक्तिगत समृद्धि अब भी एक चुनौती बनी हुई है। भारत के लगभग 85-90 प्रतिशत कृषि कार्यबल में छोटे और सीमांत किसान शामिल हैं, जो अपनी कड़ी मेहनत और उच्च उत्पादकता के बाद भी कम लाभ के चक्र में फंसे हुए हैं।
इस स्थिति के निवारण और ‘अन्नदाता‘ को ‘उद्यमी‘ के रूप में बदलने के लिए देशभर में कृषि-ऊष्मायन केंद्रों की स्थापना एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। ये केंद्र न केवल आधुनिक तकनीक और नवाचार को खेतों तक पहुँचाते हैं, बल्कि स्टार्टअप्स के माध्यम से किसानों को बाजार, मूल्य संवर्धन और बेहतर लाभ प्राप्त करने के अवसर भी प्रदान करते हैं। अब समय आ गया है कि हम केवल उत्पादन पर नहीं, बल्कि कृषि-उद्यमिता के माध्यम से किसानों की आय और टिकाऊ भविष्य पर ध्यान केंद्रित करें।
##plugins.themes.default.displayStats.downloads##
##submission.downloads##
प्रकाशित
अंक
खंड
##submission.license##
##submission.copyrightStatement##
##submission.license.cc.by-nc-sa4.footer##खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।