जलवायु अनुकूल टिकाऊ कृषि

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लेखक

  • विनोद कुमार सिंह भाकृअनुप-केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोषनगर, हैदराबाद-500059
  • ए.के. इंदोरिया भाकृअनुप-केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोषनगर, हैदराबाद-500059
  • मुन्नालाल भाकृअनुप-केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोषनगर, हैदराबाद-500059
  • सुमंत कुंडू भाकृअनुप-केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोषनगर, हैदराबाद-500059

सार

विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। यहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में महाराष्ट्र में अंगूर सहित कई बागवानी पफसलें नष्ट हुईं। मध्‍य प्रदेश में वर्ष 2014 और वर्ष 2015 में सोयाबीन की पफली निर्माण अवस्था पर ओलावृष्टि और अत्यधिक वर्षा के कारण भारी नुकसान हुआ। ये केवल कुछ उदाहरण हैं जलवायु जोखिमों के कारण कई अन्य पफसलें, बागवानी, पशुधन, मत्स्य एवं कुक्कुट पालन में भी नुकसान हो रहा है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए जलवायु अनुकूल कृषि को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। यह न केवल पफसलों की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और कृषि की स्थिरता बनाए रखने का भी प्रभावी उपाय है।

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प्रकाशित

2026-03-20