बागवानी आधारित समन्वित कृषि प्रणाली माॅडल
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भारत में आज भी 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण जनसंख्या अपने जीविकोपार्जन के लिए खेती पर निर्भर है। इसके अलावा, लगभग 86 प्रतिशत किसान सीमान्त और लघुवर्गीय श्रेणी में आते हैं। इसके बावजूद आज भी कृषि को पर्याप्त रोजगार का साधन नहीं मानते। इसका मुख्य कारण कृषि में संसाधनों का बढ़ता मूल्य, उत्पादन लागत में वृद्धि, फसल का उचित मूल्य न मिलना और दिन-प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या के कारण खेतों के आकार का छोटा होना है। एक तरफ, हरित क्रांति की शुरुआत से लेकर अब तक संसाधनों की कमी ;श्रमिक और सिंचाईद्ध के कारण एकल पफसल प्रणाली पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। वहीं दूसरी ओर, कुछ पफसलों जैसे-धान और गेहूं को ही समर्थन मूल्य मिलने के कारण किसान लगातार एक ही प्रकार के पफसल उत्पादन में लगे हुए हैं। परन्तु हमारी जरूरतें-धान्य के साथ-साथ दाल, तिलहन, सब्जियां, पफल-पफूल, दुग्ध, मछली और अंडे आदि की पूर्ति और वर्षभर रोजगार-एकल पफसल प्रणाली से पूरी नहीं की जा सकती। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि कृषि में पफसल के साथ-साथ अन्य घटकों को भी सम्मिलित किया जाए। इससे किसान को सतत आय प्राप्त होगी और विभिन्न घटकों के अवशेषों का पुनर्चक्रण संसाधनों के रूप में किया जा सकेगा, जो पर्यावरण की दृष्टि से भी लाभकारी है।
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