धान-परती प्रणाली में पोषण एवं आजीविका हेतु सतत विविधीकरण

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लेखक

  • राघवेंद्र सिंह भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)
  • मोहम्मद आरिफ भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)
  • मेराज आलम अंसारी भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)
  • अमृत लाल मीणा भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)
  • कमलेश कुमार भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)
  • सुनील कुमार भाकृअनुप-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)

सार

भारत में धान परती भूमि का क्षेत्रा अत्यंत विशाल है, जो कृषि उत्पादन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपार संभावनाएं समेटे हुए है। वर्तमान में इस भूमि पर नमी की कमी, जलभराव, मृदा उर्वरता में कमी, तकनीकी ज्ञान का अभाव और विपणन से जुड़ी कठिनाइयां प्रमुख चुनौतियों के रूप में सामने हैं। धान की कटाई के बाद भूमि को खाली छोड़ देने से मृदा की उत्पादकता में निरंतर कमी आती है तथा किसानों की आय सीमित रह जाती है। इन समस्याओं के समाधान के रूप में लघु अवधि वाली दलहनी, तिलहनी, सब्जियों एवं चारा फसलों की खेती एक उपयोगी विकल्प सिद्ध हो सकती है। ये फसलें कम समय में तैयार होकर किसानों को अतिरिक्त आय, पोषण एवं मृदा उर्वरता में सुधार का अवसर प्रदान करती हैं। इसके साथ ही, फसल विविधीकरण एवं समेकित कृषि प्रणाली जैसे फसल-पशुपालन-बागवानी-मत्स्य पालन माॅडल भूमि उपयोग दक्षता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने और किसानों की आय दोगुनी करने में सहायक हो सकते हैं। सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाएं, जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना आदि, इन परती भूमि क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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प्रकाशित

2026-03-20