संरक्षण कृषि के बुनियादी सिद्धान्त, तकनीकी लाभ एवं चुनौतियां

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लेखक

  • राकेश कुमार वरिष्ठ वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान), फसल अनुसंधान विभाग, भाकृअनुप का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना-800014, बिहार
  • रघुबर साहू सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान विभाग, भाकृअनुप का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना-800014, बिहार
  • संजीव कुमार सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक, पौधा रोग विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210 (बिहार)
  • प्रवीण कुमार उपाध्याय वैज्ञानिक, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210 (बिहार)
  • राजीव कुमार सिंह प्रधान वैज्ञानिक, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012
  • संजय सिंह राठौर अध्यक्ष, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012

सार

संरक्षण कृषि टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती की प्रणाली है, जो मृदा, जल और जैव विविधता को संरक्षित रखते हुए उत्पादन को स्थिर और दीर्घकालिक बनाती है। यह न्यूनतम जुताई, पफसल अवशेष प्रबंधन और पफसल विविधीकरण जैसे मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है। संरक्षण कृषि अपनाने से मृदा और जल का संरक्षण, लागत में कमी, उत्पादन की स्थिरता, पर्यावरण संरक्षण और कार्बन संचयन जैसे अनेक लाभ मिलते हैं। हालांकि, प्रारंभिक लागत, यंत्रों की उपलब्धता और किसानों में जागरूकता जैसी चुनौतियां भी इस प्रणाली के विस्तार में बाधक बन सकती हैं। इसके बावजूद, संरक्षण कृषि किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को टिकाऊ, आत्मनिर्भर एवं पर्यावरण अनुकूल बनाने में एक प्रभावी साधन साबित होती है।

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प्रकाशित

2026-03-20