प्राकृतिक खेती का भविष्य में योगदान

51 / 65

लेखक

  • भवानी शंकर मीणा कृषि अनुसंधान केंद्र, उम्मेदगंज, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा
  • श्रवण कुमार यादव कृषि अनुसंधान केंद्र, उम्मेदगंज, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा
  • शांति कुमार शर्मा सहायक महानिदेशक ;मानव संसाधन प्रबंधन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली
  • एस.एन. मीणा कृषि अनुसंधान केंद्र, उम्मेदगंज, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा

सार

रसायनों पर बढ़ती निर्भरता ने मृदा की उर्वरता, भौतिक और जैविक गुणों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप मृदा की उत्पादकता घट रही है, सूक्ष्मजीवों की
संख्या कम हो रही है और पोषक तत्वों का प्राकृतिक चक्रण बाधित हो रहा है। इसके साथ ही, रासायनिक अवशेषों के कारण भू-जल और सतही जल प्रदूषित हो रहे हैं,
जिससे मानव और पशु स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस संदर्भ में प्राकृतिक खेती एक अत्यंत उपयोगी, पर्यावरण-अनुकूल और किपफायती विकल्प के रूप में उभर
रही है। यह न केवल मृदा के स्वास्थ्य को पुनस्र्थापित करती है, बल्कि जल संरक्षण, कार्बन संचयन और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी मदद करती है। इसके साथ
ही, इससे किसानों की उत्पादन लागत घटती है, उनकी आय बढ़ती है और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।

##plugins.themes.default.displayStats.downloads##

##plugins.themes.default.displayStats.noStats##

##submission.downloads##

प्रकाशित

2026-03-20