कपास में टिंडा सड़न रोग
227 / 70सार
कपास (गाॅसिपियम प्रजाति, कुलः मालवेसीद्) विश्व की सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। यह न केवल सबसे अधिक व्यावसायिक मूल्य वाले प्राकृतिक वस्त्रा रेशों का प्रमुख स्रोत है, बल्कि पशु आहार में प्रयुक्त प्रोटीन और तेल का भी महत्वपूर्ण साधन है। भारत, विश्व स्तर पर कपास उत्पादन में अग्रणी है और वैश्विक कुल क्षेत्रफल में लगभग 40 प्रतिशत तथा कुल उत्पादन में 21 प्रतिशत का योगदान देता है। छह माह या उससे अधिक समय तक खेत में खड़ी रहने वाली कपास की फसल 60 से अधिक रोगों के प्रति संवेदनशील रहती है, जिसके कारण पैदावार में कमी तथा उत्पादन लागत में वृद्धि हो सकती है। बीटी-कपास के व्यावसायीकरण तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण कपास रोगों की प्रकृति और उनकी तीव्रता में कापफी परिवर्तन देखने को मिला है। हाल के वर्षों में टिंडा सड़न रोग ने अपने व्यापक प्रकोप और संभावित उपज एवं गुणवत्ता हानि के कारण विशेष ध्यान आकर्षित किया है। कपास के टिंडों (डोडों) का सूक्ष्मजीवीय क्षय या सड़न, जो विभिन्न वनस्पति रोगजनक फफूंद, जीवाणुओं तथा मृतजीवियों द्वारा उत्पन्न होता है, को ही टिंडा सड़न कहा जाता है। इस रोग का प्रभावी नियंत्राण समेकित नाशीजीव प्रबंधन रणनीतियों के माध्यम से संभव है, जिनकी जानकारी इस लेख में विस्तार से प्रस्तुत की गई है।
##plugins.themes.default.displayStats.downloads##
##submission.downloads##
प्रकाशित
अंक
खंड
##submission.license##
##submission.copyrightStatement##
##submission.license.cc.by-nc-sa4.footer##खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।