जलवायु परिवर्तन, रोग प्रतिरोध और लैंगिक न्याय से कृषि का पुनरावलोकन

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लेखक

  • प्रियंका चैधरी 1पी.एच.डी. पादप रोगविज्ञान, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, स्कूल आफ जेंडर स्टडीज, इग्नू, पटना (बिहार)
  • रवि प्रकाश भ्रमणशील पशु चिकित्सा पदाधिकारी, पीरो (बिहार)
  • प्रीति उपाध्याय शाकीय विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भाकृअनुसं, दिल्ली

सार

जलवायु परिवर्तन ने कृषि की पारंपरिक स्थिरता को गहराई से प्रभावित किया है और इसे नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। वैश्विक तापमान में वृद्धि, बढ़ती आर्द्रता और अनिश्चित वर्षा चक्रों के कारण रोगजनकों की प्रकृति, उनकी सक्रियता अवधि, प्रसार क्षमता और रोगजनकता में गंभीर बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं। परिणामस्वरूप पफसल रोगों की तीव्रता और संक्रमण दर बढ़ रही है, जिससे उपज, गुणवत्ता और कृषि आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसका असर पशुपालन, मृदा स्वास्थ्य, जल प्रबंधन और खेत संचालन से जुड़े कार्यों पर भी दिखाई दे रहा है। इसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। बदलती जलवायु के कारण उनके श्रम, स्वास्थ्य और संसाधन प्रबंधन संबंधी दबाव में भी वृद्धि हुई है। यह लेख कृषि रोग प्रबंधन को समावेशी, लैंगिक-संवेदनशील और अंतःविषय दृष्टिकोण से समझने और प्रभावी समाधान की दिशा में प्रयास करने पर बल देता है।

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प्रकाशित

2026-01-03