फसलोत्पादन एवं मानव पोषण में जिंक की भूमिका

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लेखक

  • शबनम बागवानी एवं औद्यानिकी महाविद्यालय, थुनाग स्थित गोहर (गुडाहरी), डा. यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं औद्यानिकी विश्वविद्यालय, सोलन (हिमाचल प्रदेश)
  • राजीव कुमार बागवानी एवं औद्यानिकी महाविद्यालय, थुनाग स्थित गोहर (गुडाहरी), डा. यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं औद्यानिकी विश्वविद्यालय, सोलन (हिमाचल प्रदेश)
  • नेहा चैहान कृषि विज्ञान केंद्र, मंडी स्थित सुंदरनगर (हिमाचल प्रदेश)

सार

सूक्ष्म पोषक तत्वों  में जिंक को भारत में मुख्य पोषक तत्वों-नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस, पोटाश सल्फर, कैल्शियम और मैग्नीशियम के बाद पांचवां सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व माना जाता है। जिंक पौधों के साथ-साथ मनुष्य और पशुओं के लिए भी अत्यावश्यक है, जो पौधों की उपज तथा चारे का उपभोग करते हैं। मृदा में जिंक की कमी गंभीर पोषण संबंधी समस्याएं उत्पन्न करती है। मानव को आवश्यक पोषक तत्वों का बड़ा भाग मृदा के माध्यम से पौधों के खाद्य हिस्सों में पहुंचता है। पौधों में जिंक की कम मात्रा मृदा में इसकी कमी का संकेत देती है। भारतीय मृदा में जिंक की 0.60 मि.ग्रा./कि.ग्रा. की क्रांतिक रेखा निर्धारित की गई है। वहीं, पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए पौधे में 20 मि.ग्रा./कि.ग्रा. जिंक का स्तर उपयुक्त पाया गया है। जिंकहीन मृदा में पफसल लगाने से पौधों में इस तत्व की गंभीर कमी हो जाती है। इससे उपज एवं पोषण गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अनुमान है कि विश्व की लगभग 20 प्रतिशत मानव आबादी जिकं की कमी का जोखिम 30 प्रतिशत तक बढ़ गया है। फसलों में जिंक मी मात्रा को आनुवंशिक सुधार, जैव सुदृढ़ीकरण तथा कृषि प्रंबधन तकनीकों के माध्यम से बढ़ाकर राष्ट्रीय स्तर पर मानव पोषण में सुधार किया जा सकता है।

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प्रकाशित

2026-03-20