धान की प्राकृतिक खेती

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लेखक

  • आलोक कुमार सिंह राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली-110012
  • दिग्विजय सिंह डा. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार-848125
  • रत्नेश कुमार झा डा. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार-848125
  • हर्षिता सिंह सैम हिगिनबाॅटम कृषि, प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय, प्रयागराज-211007 (उत्तर प्रदेश)
  • श्रीपति द्विवेदी डा. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार-848125

सार

प्राकृतिक खेती केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, जो किसानों को स्वावलंबी बनाती है और पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त करती है। वर्तमान समय में प्राकृतिक खेती की आवश्यकता इसलिए और अधिक बढ़ गई है, क्योंकि रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से न केवल पफसल उत्पादन लागत बढ़ रही है, बल्कि मृदा की उर्वरता, जैविक संरचना तथा खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आधुनिक कृषि प्रणालियों में रासायनिक पदार्थों का अत्यधिक प्रयोग मृदा के स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिकी संतुलन के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। इसके विपरीत, प्राकृतिक खेती में देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्रा से तैयार बीजामृत, जीवामृत तथा घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक इनपुट का उपयोग किया जाता है। ये पदार्थ न केवल उत्पादन लागत को कम करते हैं, बल्कि मृदा में कार्बनिक पदार्थ, आवश्यक पोषक तत्वों तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की मात्रा बढ़ाकर मृदा की जैविक सक्रियता को सु-ढ़ करते हैं। परिणामस्वरूप पफसलों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा मिलता है।

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प्रकाशित

2026-03-20