श्री अन्न फसलों में रोगों की रोकथाम

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लेखक

  • संजीव कुमार Kheti पौधा रोग विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर-813210 (बिहार)
  • सी.एस. आजाद पौधा रोग विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर-813210 (बिहार)
  • देवेन्द्र मंडल पौधा रोग विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर-813210 (बिहार)
  • राकेश कुमार वरिष्ठ वैज्ञानिक, भाकृअनुप का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना-800014 (बिहार)

सार

भारत में उगाए जाने वाले श्री अन्न के अंतर्गत मुख्यतः ज्वार, बाजरा, सांवा, कोदो, कुटकी तथा रागी जैसी फसलें शामिल हैं। ये फसलें न केवल पोषक तत्वों
से भरपूर होती हैं, बल्कि पारंपरिक खाद्यान्न गेहूं और धान की तुलना में कई मामलों में अधिक लाभकारी भी मानी जाती हैं। इसी कारण आज इन्हें ‘पोषक अनाज’ के
रूप में विशेष पहचान प्राप्त हो रही है। कई श्री अन्न फसलों में प्रोटीन की मात्रा गेहूं के लगभग समान होती है, जबकि विटामिन बी, लौह, फाॅस्फोरस, कैल्शियम
एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की दृष्टि से ये अधिक समृद्ध होते हैं। श्री अन्न की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जलवायु सहनशीलता है। ये फसलें कम वर्षा, अधिक
तापमान, सूखा तथा अम्लीय भूमि जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, श्री अन्न की फसलें कम लागत में उत्पादन देने
वाली होने के कारण छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए भी लाभकारी हैं। हालांकि, अन्य फसलों की तरह श्री अन्न भी विभिन्न रोगों एवं कीटों से प्रभावित हो सकती
हैं। अतः समय पर पहचान एवं उचित प्रबंधन अपनाकर फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है तथा भविष्य की पोषण एवं खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं की
पूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है।

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प्रकाशित

2026-06-05

अंक

खंड

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