टिकाऊ फसल उत्पादन में फसल अवशेष प्रबंधन
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सिंधु गंगा के मैदानी क्षेत्रों में सघन रूप से अपनाई जाने वाली धान-गेहूं, फसल प्रणाली है। इसने दक्षिण एशिया की बढ़ती आबादी की खाद्यान्न आपूर्ति को पूरा करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। उत्तर भारतीय मैदानी इलाकों में लंबे समय तक पारंपरिक तरीके से धान की सघन खेती के पफलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता में कमी, घटती कारक उत्पादकता, पोषक तत्वों की कमी, कम होता भूजल, श्रम की कमी, खेती की उच्च लागत और अवशेष जलाने जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं। इनसे कृषि की स्थिरता पर संदेह व्यक्त होता है। भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 680 मिलियन टन से ज्यादा पफसल अवशेष उत्पन्न होता है, जिसमें से लगभग 368 मिलियन टन केवल अनाज पफसलों से आता है। फसल अवशेष के कुल उत्पादन में धान और गेहूं क्रमशः लगभग 154 और 131 मिलियन टन का योगदान करते हैं।
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