कृषि में अंतःपादपी जीवाणुओं की भूमिका

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लेखक

  • जे.के. ठाकुर भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)
  • असित मंडल भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)
  • ए.बी. सिंह भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)
  • निशांत कुमार सिन्हा भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)
  • अशोक के. पात्रा भाकृअनुप-भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)

सार

जीवाणु प्रकृति में कई प्रतिक्रियाओं का संचालन कर पारिस्थितिकी तंत्रा सेवाएं सुनिश्चित करते हैं। जीवाणु एवं पौधे मृदा पारिस्थितिकी तंत्रा के महत्वपूर्ण घटक हैं। ये दोनों हमेशा से समान जलवायु स्थिति के तहत एक दूसरे के लगातार संपर्क में सहअस्तित्व को बनाए हुए हैं। इस परस्पर प्रक्रिया में कुछ जीवाणुओं ने पौधे के अंतः भागों में अपने आप को स्थापित कर लिया और वे अंतः पादपी जीवाणु के रूप में जाने गये। अतः ऐसे सूक्ष्मजीव, जो अपने जीवनचक्र का कम से कम एक काल पौधे के अंदर, मेजबान पौधे को बिना नुकसान पहुंचाए एवं बिना किसी रोग के लक्षण प्रदर्शित करते हुए जीवित कोशिकाओं में निवास करते हों, अंतःपादपी जीवाणु कहलाते हैं।

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प्रकाशित

2023-03-17