राई-सरसों में खरपतवारों से हानि

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लेखक

  • मोहन लाल दौतानिया भाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर-321303 (राजस्थान)
  • चेतन कुमार दौतानिया कृषि महाविद्यालय, स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर-334006 (राजस्थान)
  • मुरलीधर मीणा भाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर-321303 (राजस्थान)
  • राम लाल चौधरी भाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर-321303 (राजस्थान)
  • मुकेश कुमार मीणा भाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर-321303 (राजस्थान)

सार

राई-सरसों फसल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा व मध्य प्रदेश में बोई जाती है। यह फसल इन क्षेत्रों की मुख्य फसल है तथा आय का स्रोत है। राई-सरसों की फसल अक्टूबर में बोई जाती है तथा फरवरी के अंत तक इसकी कटाई की जाती है। यह फसल कम पानी में भी अन्य फसलों की तुलना में ठीक उपज देती है। इसके लिए 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश एवं 40 कि.ग्रा. सल्फर की आवश्यकता होती है। आधी मात्रा नाइट्रोजन एवं पूरी मात्रा फाॅस्फोरस, पोटाश एवं सल्फर की बुआई के समय मृदा में मिला देनी चाहिए। राई-सरसों में खरपतवार 4 सप्ताह तक अधिक प्रतियोगिता करता है। इस अवस्था में यदि खरपतवार नियंत्राण नहीं हो पाता है, तो फसल की उपज पर्याप्त नहीं होती है। प्रारम्भिक अवस्थाओं में फसल की बृद्धि भी कम होती है, जिससे फसल को खरपतवारों से अधिक प्रतिस्पर्ध करनी पड़ती है। अतः इस अवस्था में फसल को खरपतवारमुक्त करने की जरूरत होती है।

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प्रकाशित

2023-03-17