सरसों की उन्नत किस्म ‘आरएच-1706‘ से बढ़ी आमदनी
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हरियाणा भारत का एक प्रमुख कृषि राज्य है। यहां धान-गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इससे देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। लेकिन लंबे समय से एक ही फसल प्रणाली अपनाने से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आई है। अधिक मात्रा में कृषि आदानों के प्रयोग से संसाधनों की उपयोग क्षमता भी कम हुई है। इससे खेती की लागत बढ़ी है और किसानों की आय प्रभावित हुई है। इसलिए तिलहनी और दलहनी फसलों को फसल प्रणाली में शामिल करना जरूरी है। रोहतक जिला, उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानी भाग के अर्ध-शुष्क कृषि-जलवायु क्षेत्र में स्थित है। यहां की बलुई दोमट मिट्टी और जलवायु सरसों की खेती के लिए उपयुक्त हैं। कई किसान अभी भी सरसों की पुरानी किस्मों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों का उपयोग कर रहे हैं। इससे उपज कम होने के साथ-साथ उत्पादन लागत भी बढ़ती है। खरपतवार, रोग और कीटों के प्रकोप से भी किसानों को नुकसान होता है। इसलिए उन्नत सरसों की किस्मों के साथ एकीकृत फसल प्रबंधन अपनाना समय की मांग है। धान-सरसों-ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली हरियाणा, पंजाब ओर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धान-गेहूं फसलचक्र की जगह एक अच्छा विकल्प भी हो सकता हैं। इससे सकल उत्पादन, मिट्टी का स्वास्थ्य और किसान की आय बढ़ाई जा सकती हैं।
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