शून्य जुताई की बढ़ती उपयोगिता
3 / 8सार
शून्य जुताई (जीरो टिलेज) आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि की एक महत्वपूर्ण मृदा-संरक्षण आधारित पद्धति है, जिसमें बिना पारंपरिक जुताई किए सीधे फसल की बुवाई की जाती है तथा फसल अवशेषों को मृदा की सतह पर बनाए रखा जाता है। यह तकनीक मृदा संरचना एवं उर्वरता के संरक्षण, मृदा अपरदन में कमी, नमी संरक्षण तथा जल-उपयोग दक्षता में सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शून्य जुताई से जुताई की आवश्यकता कम होने के कारण ईंधन, श्रम, समय एवं मशीनरी पर होने वाले व्यय में कमी आती है, जिससे खेती की उत्पादन लागत कम होती है और किसानों की लाभप्रदता बढ़ सकती है। सतह पर फसल अवशेषों की उपस्थिति मृदा के तापमान एवं वाष्पीकरण को नियंत्रित करती है तथा कार्बनिक पदार्थों के संचय और सूक्ष्मजीवी गतिविधियों को बढ़ावा देती है। इसके अतिरिक्त, यह प्रणाली मृदा में जल एवं पोषक तत्वों के संरक्षण में सहायक होने के साथ-साथ कार्बन संचयन और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में योगदान दे सकती है। भारतीय परिस्थितियों में, विशेषकर गेहूँ–धान जैसी फसल प्रणालियों तथा जल एवं श्रम की कमी वाले क्षेत्रों में, शून्य जुताई एक संसाधन-संरक्षणकारी विकल्प के रूप में उपयोगी है। अतः शून्य जुताई को उपयुक्त अवशेष प्रबंधन, फसल चक्र, खरपतवार प्रबंधन तथा उन्नत बीज-बुवाई तकनीकों के साथ अपनाकर उत्पादकता, आर्थिक दक्षता और मृदा स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
##plugins.themes.default.displayStats.downloads##
##submission.downloads##
प्रकाशित
अंक
खंड
##submission.license##
##submission.copyrightStatement##
##submission.license.cc.by-nc-nd4.footer##खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।