तिलहन उप-उत्पादों से पोषण और मूल्य संवर्धन
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खल तेल निष्कर्षण के बाद प्राप्त होने वाला एक महत्वपूर्ण कृषि-औद्योगिक उप-उत्पाद है। सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, सरसों, रेपसीड, कपास, अलसी, नारियल, राइस ब्रान तथा रामतिल (नाइजर) की खलें प्रोटीन, आहार रेशा, खनिज, विटामिन तथा जैव-सक्रिय यौगिकों से समृद्ध होती हैं। इनमें लगभग 20–50% तक प्रोटीन पाया जा सकता है, इसलिए ये पशु एवं मत्स्य आहार के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।. तिलहन खलों में फेनोलिक्स, फ्लेवोनॉयड्स, टोकोफेरॉल और लिग्नान जैसे यौगिक पाए जाते हैं, जो इनके एंटीऑक्सीडेंट तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक गुणों में योगदान करते हैं। इनका उपयोग प्रोटीन आइसोलेट, प्रोटीन कॉन्संट्रेट, प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट, आहार रेशा, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, पोषक सप्लीमेंट, पशु आहार, जैव उर्वरक तथा जैव-आधारित उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है।. हालांकि कुछ खलों में फाइटिक अम्ल, टैनिन, ग्लूकोसाइनोलेट, गॉसिपोल तथा ट्रिप्सिन अवरोधक जैसे प्रतिपोषक तत्व पाए जाते हैं। ऊष्मा उपचार, किण्वन, अंकुरण तथा एंजाइमेटिक प्रसंस्करण द्वारा इन्हें कम किया जा सकता है। अतः तिलहन खलों का मूल्य संवर्धन पोषण सुरक्षा, किसान आय, संसाधन दक्षता और सतत कृषि के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
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