फोग है शुष्क क्षेत्रों का उत्तम पशु चारा

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लेखक

  • प्रियंका गौतम वरिष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर
  • शांतनु रक्षित वैज्ञानिक, केंद्रीय बागवानी परीक्षण केंद्र, भुबनेश्वर, ओडिशा
  • बनवारी लाल वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, बीकानेर (राजस्थान)
  • बसंती ज्योत्सना वरिष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर
  • वेद प्रकाश वरिष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर

सार

फोग (कैलिगोनम पाॅलीगोनोइड्स एल.) शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण सूखा-सहिष्णु बहुवर्षीय झाड़ी है। यह चारे और ईंधन की लकड़ी का स्रोत होने के
साथ-साथ बालू के टीलों के स्थिरीकरण तथा मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पाॅलीगोनेसी कुल से संबंधित फोग को स्थानीय रूप से ‘फोगला’, ‘फोग’ और ‘फोगरो’ आदि नामों से जाना जाता है। यह सामान्यतः 3-6 फीट ऊंची झाड़ी होती है। इसकी शाखाएं सफ़ेद और नाजुक होती हैं तथा शीतकाल में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं। यह थार रेगिस्तान की अत्यधिक गर्मी, सूखे और कम तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम है तथा क्षेत्रा की प्रमुख जैवमास उत्पादक प्रजातियों में से एक है। फोग मुख्यतः लंबे, आड़े और अर्धवृत्ताकार बालू के टीलों पर उगती है तथा इसे सामोफाइटिक मरुस्थलीय वनस्पति समुदाय का एक प्रमुख घटक माना जाता है। फोग स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जैसे कि बालू के टीलों को स्थिर करना, जैव विविधता का समर्थन करना और खासतौर पर ऊंटों के लिए मूल्यवान चारा प्रदान करना। पारंपरिक रूप से, इसका उपयोग स्वदेशी समुदायों द्वारा ईंधन और औषधीय उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। पफोग की सहनशीलता, उपयोगिता, और पारिस्थितिकीय मूल्य इसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण प्रजाति बनाते हैं।

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प्रकाशित

2026-09-15