टिकाऊ कृषि हेतु प्रभावी प्राकृतिक खेती

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लेखक

  • सुशील कुमार शर्मा भाकृअनुप-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)
  • नारायण साहू भाकृअनुप-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)
  • विनोद कुमार वासनिक भाकृअनुप-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)
  • ललित लक्ष्मण खरबीकर भाकृअनुप-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)
  • अनिल दीक्षित भाकृअनुप-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)

सार

प्राकृतिक खेती स्थानीय संसाधनों के उपयोग, मृदा स्वास्थ्य के संरक्षण और खेती की लागत कम करने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है। इसमें रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करते हुए जैव आदानों, पफसल अवशेष, आच्छादन और खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग पर विशेष जोर दिया जाता है। वन एवं जैव विविधता से समृद्ध छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक खेती के विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। राज्य में बड़ी संख्या में लघु एवं सीमांत किसान होने के कारण कम लागत वाली यह कृषि पद्धति उनकी आजीविका को अधिक टिकाऊ बनाने में सहायक हो सकती है। हालांकि, प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण जैव आदान की उपलब्धता, तकनीकी जानकारी, उचित आच्छादन सामग्री और किसानों को निरंतर मार्गदर्शन जैसी चुनौतियों का समाधान भी आवश्यक है। ऐसे में स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग प्राकृतिक खेती को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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प्रकाशित

2026-10-15