मृदा उर्वरता बढ़ाए हरी खाद
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पारंपरिक खेती में कृषकों द्वारा फसल उत्पादन बिना उर्वरकों के उपयोग से किया जाता था। जनसंख्या वृद्धि के साथ उत्पादन बढ़ाने के दबाव में पारंपरिक खेती के तरीके पीछे छूटते गये और आज इस मुकाम पर आ पहुंचे हैं कि उत्पादन तो आवश्यकतानुसार हो रहा है, परन्तु मृदा की उर्वरता एवं स्वास्थ्य में लगातार गिरावट होती जा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण है उर्वरकों का असंतुलित उपयोग। उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मृदा में अनेक पोषक तत्वों की कमी हो गयी है। इसके अलावा खेती के पारंपरिक तरीके, जिनमें बैलों द्वारा खेतों में जुताई का कार्य किया जाता था, लगभग खत्म हो गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि खेतों में गोबर की खाद के उपयोग में कापफी कमी आयी है। अब मृदा उर्वरता एवं स्वास्थ्य में सुधार
हेतु ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, जिनमें हरी खादों का उपयोग एक सस्ता एवं बहुत ही महत्वपूर्ण उपाय है। हरी खाद द्वारा मृदा की उर्वराशक्ति तो बढ़ती ही है, इसके साथ ही बहुत सी अन्य समस्याओं का भी समाधान होता है। इससे उत्पादन लागत में कमी आती है तथा आर्थिक लाभ में वृद्धि होती है।
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