कृषि परिवेश में जैविक प्रमाणीकरण

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लेखक

  • नसीब चौधरी चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा)
  • मोनिका देवी चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा)
  • आरएन श्योकंद चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा)

सार

पिछले 10-15 वर्षों से यह सि( हो चुका है, कि जैविक खेती, विशेषकर सीमांत और छोटे किसानों को, आर्थिक और सामाजिक लाभ पहुंचा रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एपफए.ओ) के आंकड़ों के अनुसार कई विकासशील देशों (जिसमें भारत भी शामिल है) का बहुत सा कृषि क्षेत्रा आज भी परंपरागत खेती पर ही निर्भर है और यह रासायनिक पदार्थों से मुक्त है। ऐसे क्षेत्रों को जैविक खेती के लिये उपयोग में लाना और उनके उत्पादों का विपणन करना जरूरी है। इसके लिये जैविक उत्पादों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिये जैविक प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है। आज का उपभोक्ता अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूक है। वह स्वयं व अपने परिवार को पोषक भोजन देना चाहता है। इसलिये वह जैविक उत्पादों के लिये अच्छे दाम भी देने के लिये तैयार है। बस जरूरत है, तो सही जैविक प्रमाणीकरण की। यह इसलिए कि जैविक किसानों और उपभोक्ताओं के बीच विश्वास बना रहे। जैविक
प्रमाणीकरण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त जैविक प्रमाणीकरण संस्थाओं द्वारा जैविक उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे-उत्पादन, प्रसंस्करण, भण्डारण आदि का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय जैविक मानकों के आधार पर निरीक्षण किया जाता है। इसके उपरांत किसानों को ‘प्रमाणित जैविक खेती/उत्पाद’ का प्रमाण पत्रा दिया जाता है। जैविक उत्पाद उगाने वाला किसान ‘प्रमाणित जैविक उत्पादक किसान’ कहलाता है।

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प्रकाशित

2024-04-02