प्राकृतिक खेती है रसायनमुक्त कृषि
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हरित क्रांति युग के बाद भारत के खाद्य उत्पादन में जबरदस्त वृद्धि हुई है। इसके साथ ही देश आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रहा है। गहन फसल प्रणाली, उच्च उपज देने वाली किस्मों के बीज, रासायनिक उर्वरकों, सिंचाई और कृषि यंत्राीकरण जैसी नई प्रौद्योगिकियों के उपयोग से देश अब खाद्य आत्मनिर्भर है और यहां तक कि कई कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहा है। एक ही समय में, कृषि-क्षेत्रा की गहनता ने कई कमियों और महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रतिकूलताओं को जन्म दिया है। इनमें से कुछ हैं-हल्की परत में मिट्टी का संघनन, मृदा क्षरण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जैव विविधता की हानि, शाकनाशी-प्रतिरोधी खरपतवारों का उदय इत्यादि। वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, हरित और स्थायी खाद्य उत्पादन के बिना वैकल्पिक कृषि प्रणालियों पर विचार करने की आवश्यकता है। मौजूदा दृष्टिकोणों में, प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को मृदा जीवन में सुधार तथा पफसल विकास के लिए इष्टतम स्थिति सुनिश्चित करने तथा विविध समस्याओं को दूर करने के तरीकों के रूप में देखा जा रहा है।
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