आंवले के लिए टिकाऊ बागवानी पद्धतिया

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लेखक

  • श्री शिवम कुमार राजपूत भाकृअनुप, भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु, कर्नाटक https://orcid.org/0009-0006-8101-3322 ##orcid.unauthenticated##
  • Mr Satyabhan आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या, उत्तर प्रदेश

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आंवला, नरेंद्र आंवला, मुरब्बा, कैंडी एवं सतत उद्यानिकी

सार

आंवला देश के सबसे महत्वपूर्ण फलों में से एक है। इसकी उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई है। विभिन्न क्षेत्रों एवं जलवायु में इसकी उत्पादन क्षमता, आकर्षक रंग, पोषक तत्वों की प्रचुरता, मधुर स्वाद एवं सुगंध, व्यावसायिक व अन्य किस्मों की उपलब्धता तथा औषधीय दृष्टि से बहुत अच्छा होता है। औषधीय गुणों से भरपूर आंवला का वृक्ष परिस्थितियों के लिए सहिष्णु होता है। इसलिए इसके पेड़ अनुपजाऊ भूमियों जैसे—ऊसर का वृक्ष विपरीत बंजर एवं परती भूमि में सफलतापूर्वक उगाये जा सकते हैं। कठिन कृषि परिस्थितियों में तथा कम देखभाल के बावजूद आसानी से उग सकने के कारण आंवला की खेती लोकप्रिय हो रही है और इसे भविष्य का फल माना जा रहा है।

आंवला का फल विटामिन-सी का प्रमुख स्रोत है। फलों में टैनिन्स उपस्थित होने के कारण विटामिन-सी ऑक्सीकरण द्वारा नष्ट नहीं होता है। यही कारण है कि सूखे तथा संरक्षित फलों में भी विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। आंवला का ताजे फलों के रूप में नगण्य मात्रा में प्रयोग होता है। इसकी अधिकांश मात्रा संरक्षित पदार्थों के रूप में प्रयोग की जाती है। फलों से अचार, जैम, कैंडी, मुरब्बा, चटनी, शरबत, लड्डू आदि बनाये जाते हैं। आंवला, त्रिफला एवं च्यवनप्राश जैसी औषधियों का मुख्य घटक होता है। फलों का पोषण मूल्य सारणी में दिया गया है।

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  • ##submission.authorWithAffiliation##

    पीएच.डी. शोध छात्र (फल विज्ञान),
    भाकृअनुप, भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु, कर्नाटक

  • ##submission.authorWithAffiliation##

     पीएच.डी. शोध छात्र (फल विज्ञान),
    आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या, उत्तर प्रदेश

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प्रकाशित

2026-05-18