शुष्क शीतोष्ण क्षेत्रों की संजीवनी सी-बकथाॅर्न

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लेखक

  • दुर्गा प्रसाद भंडारी कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर, 172107 हिमाचल प्रदेश
  • इंद्र देव निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, डाॅ. वाई एस परमार औद्यानिकी और वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन-173 220, हिमाचल प्रदेश
  • प्रमोद कुमार सह-निदेशक और प्रमुख कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर, 172107 हिमाचल प्रदेश
  • अरूण नेगी कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर, 172107 हिमाचल प्रदेश

सार

सी-बकथाॅर्न (हिप्पोपफे एसपी) को हिंदी में प्रचलित रूप से सी-बकथाॅर्न ही कहा जाता है, किंतु इसे लेह बेरी या हिमालयी बेरी के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश में इसे स्थानीय रूप से छरमा कहा जाता है, जबकि इसे वंडर बेरी, लेह बेरी तथा लद्दाख गोल्ड जैसे नामों से भी संबोध्ति किया जाता है। सी-बकथाॅर्न किन्नौर जिले की लगभग सभी पंचायतों में पाया जाता है। सांगला घाटी में यह मुख्यतः वृक्ष के रूप में विकसित होता है तथा इसकी लकड़ी का उपयोग सर्दियों में ईंध्न के रूप में आग जलाने के लिए किया जाता है। इस पौध्े के फलों (बेरी) से रस निकाला जाता है, जो पीले रंग का होता है। परंपरागत रूप से इस रस का उपयोग मनुष्यों और पशुओं द्वारा ग्रहण किए गए विष के प्रतिकार के रूप में सदियों से किया जाता रहा है। सर्दियों के मौसम में सूखी बेरी का उपयोग पाककला में टमाटर के विकल्प के रूप में किया जाता है, जबकि लेह-लद्दाख क्षेत्रा में इससे हर्बल चाय भी तैयार की जाती है। अपने उत्कृष्ट पोषण गुणों और स्वास्थ्यवर्धक लाभों के कारण सी-बकथाॅर्न की बेरी को ‘वंडर बेरी’ अथवा ‘ठंडे रेगिस्तान की संजीवनी’ के रूप में जाना जाता है।

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प्रकाशित

2026-03-30