अकौआ की खेती से बढ़ाएं आय
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भारत में पारंपरिक प्राकृतिक रेशों जैसे कपास और जूट की खेती में घटती उपज तथा पर्यावरणीय क्षरण की समस्या ने वैकल्पिक रेशा स्रोतों की आवश्यकता को जन्म दिया है।
इस दिशा में अकौआ/आक (कैलोट्रोपिस जाइगैन्टिया) एक उभरता हुआ विकल्प बनकर सामने आया है, जो कम लागत में उच्च गुणवत्ता का प्राकृतिक रेशा प्रदान करता है। नाॅर्दर्न
इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन, अग्रणी वस्त्रा अनुसंधन संस्थान द्वारा अकौआ के रेशों की गुणवत्ता, निष्कर्षण विधियों तथा उनके संभावित औद्योगिक उपयोग पर लगभग
18-20 वर्षों तक गहन अनुसंधन किया गया है। इस अनुसंधन के माध्यम से यह प्रमाणित किया गया कि अकौआ के तनों और फलियों से प्राप्त रेशा पर्यावरण के अनुकूल
है तथा इसका उपयोग वस्त्रा, सजावटी उत्पाद, काॅर्डेज और अन्य तकनीकी वस्त्रों के निर्माण में किया जा सकता है। संस्थान द्वारा रेशा निकालने की सस्ती और टिकाऊ तकनीकों का
विकास किया गया, साथ ही किसानों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया, जिससे वे व्यावसायिक स्तर पर इसकी खेती प्रारंभ कर सकें।
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