पुष्पों के प्रसंस्करण से ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा

24 / 32

लेखक

  • अनामिका चौरसिया Research scholar BHU
  • अंजना सिसोदिया Assistant professor
  • अनिल कुमार सिंह Professor and Head

सार

फूल प्रकृति की अनुपम देन हैं। भारतीय परंपरा में फूलों का उपयोग आयुर्वेद, यूनानी एवं लोक चिकित्सा पद्धतियों में प्राचीन काल से होता आ रहा है। ऋग्वेद, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में अनेक औषधीय फूलों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक युग में जब रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं, तब प्राकृतिक एवं हर्बल उपचारों की ओर लोगों का रुझान बढ़ा है। इस संदर्भ में औषधीय एवं खाद्य फूलों की उपयोगिता और भी प्रासंगिक हो गई है। फूलों की फसलें सामान्यतः सजावटी पौधों के रूप में पहचाने जाते हैं, किंतु वर्तमान समय में इनका महत्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रहा है। अनेक फूलों की फसलें ऐसे हैं जिनका उपयोग खाद्य पदार्थों, पेय, प्राकृतिक रंग, फ्लेवरिंग एजेंट तथा हर्बल उत्पादों में किया जा रहा है। बदलती जीवनशैली, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण खाद्य उपयोग वाले फूलों की फसल का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित भूमि, छोटे जोतधारक किसान, महिलाएँ और युवा वर्ग इन सभी के लिए औषधीय एवं खाद्य फूलों की खेती कम लागत, अधिक लाभ और सतत आजीविका का प्रभावी विकल्प बन सकती है।

##plugins.themes.default.displayStats.downloads##

##plugins.themes.default.displayStats.noStats##

##submission.downloads##

प्रकाशित

2026-09-25