गुणों से भरपूर केले की विविध प्रजातियां

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लेखक

  • एस. बाकियारण भाकृअनुप-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
  • एम.एस. सरस्वती भाकृअनुप-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
  • आर. सुधा Kheti भाकृअनुप-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
  • पी. दुरई भाकृअनुप-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
  • आर. सेल्वराजन

सार

भारत, केले की उत्पत्ति और विविधता का एक प्रमुख केन्द्र माना जाता है। दुनिया में पाए जाने वाले म्यूसेसी कुल की लगभग 80 प्रजातियों और 162 प्रकारों में से 34 प्रकार
भारत में मिलते हैं। देश में वन्य केले की सबसे अधिक विविधता पूर्वाेत्तर राज्यों में पाई जाती है, जहाँ भारत की लगभग 90 प्रतिशत वन्य केला प्रजातियाँ मौजूद हैं। इसके
अलावा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा पश्चिमी और पूर्वी घाट क्षेत्रों में भी केले की कई वन्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। म्यूसेसी कुल का एंसेटे वंश केले जैसा दिखाई देता है,
इसलिए इसे ‘वन्य केला’ भी कहा जाता है। एंसेटे ग्लाॅकम और एंसेटे सुपरबम के फल, तने और कोमल पुष्पक्रम का उपयोग पूर्वाेत्तर एवं दक्षिण भारत के कई जनजातीय समुदाय सब्जी के रूप में करते हैं। मूसा वंश की कई वन्य प्रजातियाँ, जैसे मूसा अरुणाचलेंसिस, मूसा रुब्रा, मूसा सैंगुइनिया और मूसा वेल्यूटिना अपने आकर्षक रंगीन पुष्पावरण के कारण विशेष महत्व रऽती हैं। इनके पुष्पावरण लाल, गुलाबी, पीले और बैंगनी रंगों के होते हैं, जिससे इनकी बागवानी बाजार में अच्छी मांग रहती है। इन वन्य केला प्रजातियों का उपयोग सजावटी पौधें, गमलों में उगाने वाले पौधें, कर्तित पुष्प और बगीचों की सजावट के लिए बड़े स्तर पर किया जा सकता है। इन प्रजातियों का संरक्षण और व्यावसायिक उपयोग भविष्य में किसानों और उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर भी उत्पन्न कर सकता है।

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प्रकाशित

2026-07-16