अर्धशुष्क क्षेत्रों के लिए बेल की उन्नत किस्म
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बेल एक सांस्कृतिक, धर्मिक एवं पोषणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण देशज फल वृक्ष है, जिसकी खेती प्राचीन काल से भारत सहित दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों में की जाती रही है। भारत में इसे बेल, बिल्व, श्रीफल, मारेडू, बेलो, दिव्य पफल एवं बंगाल क्विंस जैसे विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है। रूटेसी कुल का यह वृक्ष सुगंध्ति पुष्पों वाला एवं आकर्षक स्वरूप का होता है, जिसके कारण इसका सजावटी महत्व भी है। बेल शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त फल वृक्ष है, क्योंकि इसमें सूखा सहन करने की उत्कृष्ट क्षमता पाई जाती है। हमारे देश में पूर्व समय में बेल के व्यवस्थित बागानों की परंपरा नहीं थी, किंतु वर्तमान में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब एवं गुजरात में उन्नत किस्मों के संगठित बागानों की स्थापना की जा रही है। सामान्यतः बेल के पौधे खेतों की मेड़ों, मंदिर परिसरों तथा गृह उद्यानों में लगाए जाते रहे हैं। प्राकृतिक वनों में भी बेल के बीजजनित पौधे पाए जाते हैं। हाल के वर्षों में देशभर से बेल के श्रेष्ठ जर्मप्लाज्म एवं उत्कृष्ट जननद्रव्यों के संग्रह, मूल्यांकन एवं संरक्षण हेतु विशेष प्रयास किए गए हैं। भाकृअनुप के विभिन्न संस्थानों, क्षेत्राीय केंद्रों एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में बेल के जर्मप्लाज्म ब्लाॅकों की स्थापना की गई है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब एवं गुजरात के प्रगतिशील किसानों ने अब बेल की व्यावसायिक खेती को बड़े स्तर पर अपनाना प्रारंभ कर दिया है। वर्तमान में बेल की खेती बागवानी फसल के रूप में तथा खेतों की सीमाओं पर सीमा वृक्षारोपण के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
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