कटुआ कीट का समेकित प्रबंधन

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Authors

  • सुमन सांजटा चैधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर-176062, (हिमाचल प्रदेश)
  • आर.एस. चंदेल चैधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर-176062, (हिमाचल प्रदेश)
  • शर्मिष्ठा ठाकुर चैधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर-176062, (हिमाचल प्रदेश)
  • कुलदीप सिंह वर्मा चैधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर-176062, (हिमाचल प्रदेश)

Abstract

कटुआ, बहुतायत में पाया जाने वाला एक बहुभक्षी कीट है। यह कीट सब्जी, अनाज तथा दलहन इत्यादि फसलों  जैसे-आलू, गोभी, मटर, भिंडी, शिमला मिर्च, बैंगन, टमाटर, खीरा, मक्का, चना तथा सरसों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है। इस कीट की सुण्डियां दिन के समय मृदा की ऊपरी सतह में छिपकर रहती हैं। रात के समय वे जमीन के बाहर आकर छोटे पौधों को जमीन की सतह के थोड़ा ऊपर से काट देती हैं। ये पत्तों और कोमल तनों को खाती हैं। इसके कारण खेत में पौधों की संख्या प्रत्यक्ष रूप से कम हो जाती है। इनके इसी व्यवहार की वजह से इनको ‘कटुआ कीट’ का नाम दिया गया है। इस कीट के पतंगे हमेशा रात के समय निकलते हैं और उपयुक्त जगह पर अण्डे देते हैं। ये जमीन में पड़ी दरारों के बीच में या पौधों के तने पर या उसके आसपास के स्थान पर हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्रा, जहां पर पर्याप्त नमी मौजूद हो, खरपतवार की समस्या ज्यादा हो तथा पानी की निकासी की सुविधा भी न हो, वहां पर इस कीट का प्रकोप ज्यादा देखने को मिलता है। यह कीट पूरे भारत में मैदानी क्षेत्रों से लेकर ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों तक पाया जाता है।

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Published

2024-06-19

How to Cite

सुमन सांजटा, आर.एस. चंदेल, शर्मिष्ठा ठाकुर, & कुलदीप सिंह वर्मा. (2024). कटुआ कीट का समेकित प्रबंधन. खेती, 76(12), 34-35. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1122