राई-सरसों में संरक्षण खेती अपनाकर बढ़ाए मुनाफा व संसाधन उपयोग दक्षता

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Authors

  • डॉ राम लाल चौधरी 9860950259

Abstract

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में अनाज वाली फसलों के बाद तिलहनों का दूसरा सबसे बड़ा योगदान है। पिछले एक दशक के दौरान क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता में क्रमशः 1.60, 6.87 एवं 3.63 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई। परन्तु, पिछले कई वर्षों से फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए खेती में संसाधनों का अत्यधिक, असंतुलित और अनुचित प्रयोग किया गया। जिसके फलस्वरूप न केवल संसाधनों का क्षरण, गुणवत्ता, एवं उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा बल्कि खेती में लागत बढ़ने से सकल लाभ में भी गिरावट देखी गई है। राई-सरसों की खेती में अधिक संख्या मे जुताई करना कम लाभ होने का मुख्य कारण है जो कार्बन डाइऑक्साइड, तापमान और वैश्विक जलवायु परिवर्तन में वृद्धि का भी एक महत्वपूर्ण कारण है। मिट्टी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य में गिरावट भी भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिये खतरनाक है। इसलिए संसाधनों का संरक्षण करने वाली तथा खेती में लागत कम करने वाली उत्पादन पद्धतियों को अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। इन विषम परिस्थितियों मेँ संरक्षण खेती ही एक वैकल्पिक विकल्प है। संरक्षण खेती एक व्यापक कृषि प्रणाली है जो मुख्य रूप से मिट्टी की जुताई को कम करने, फसल अवशेषों से मिट्टी को ढकने और फसल विविधीकरण के माध्यम से मिट्टी, पानी और पर्यावरण के संरक्षण पर जोर देती है।

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Published

2026-03-18

How to Cite

डॉ राम लाल चौधरी. (2026). राई-सरसों में संरक्षण खेती अपनाकर बढ़ाए मुनाफा व संसाधन उपयोग दक्षता. खेती, 78(9). https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1546