कपास में टिंडा सडन रोग : लक्षण, अनुकूल परिस्थितियाँ एवं समेकित प्रबंधन की रणनीतियाँ

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Authors

  • लिकोन कुमार आचार्य
  • मुकेश कुमार खोखर
  • Anoop Kumar ICAR-NRIIPM, New Delhi
  • अजंता बिराह

Keywords:

जीवाणु जनित टिंडा सडन, कवक जनित टिंडा सडन , कपास टिंडा सडन , कपास रोग

Abstract

कपास (गॉसिपियम प्रजाति, कुल: मालवेसी) विश्व स्तर पर सबसे व्यापक रूप से उगाई जाने वाली और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। यह सबसे अधिक वाणिज्यिक मूल्य वाले प्राकृतिक वस्त्र रेशों का स्रोत है और पशु आहार में प्रोटीन एवं तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है। भारत विश्व स्तर पर कपास की खेती में सबसे बड़ा भागीदार है, जो विश्व के कुल क्षेत्रफल का 40% और वैश्विक उत्पादन का 21% योगदान देता है । कपास की फसल, जो छह महीने या उससे अधिक समय तक खेत में रहती है, साठ से अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील होती है, जिससे पैदावार कम हो जाती है और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। बीटी-कपास के व्यावसायीकरण और बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण, कपास की बीमारियों की प्रवृत्ति में तेजी से बदलाव आया है। हाल ही में, टिंडा सडन ने व्यापक प्रसार और महत्वपूर्ण पैदावार एवं गुणवत्ता हानि की संभावना के कारण विशेष ध्यान आकर्षित किया है। कपास के टिंडों ( डोडे) का सूक्ष्मजीवीय क्षय या सड़न, जो विभिन्न वनस्पति रोगजनक फफूंदीय और जीवाणु रोगजनकों तथा मृतजीवी द्वारा प्रेरित होता है, को टिंडा सडन कहा जाता है। इस रोग को समेकित नाशीजीव प्रबंधन रणनीति द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है  जिसकी जानकारी इस लेख में दी गयी है I 

 

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Published

2026-03-18

How to Cite

आचार्य लिकोन कुमार, खोखर मुकेश कुमार, Kumar, A., & बिराह अजंता. (2026). कपास में टिंडा सडन रोग : लक्षण, अनुकूल परिस्थितियाँ एवं समेकित प्रबंधन की रणनीतियाँ. खेती, 78(9). https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1572