फसल विविधीकरण में तिलहनी फसलों की भूमिका

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Authors

  • सुभाष बाबू भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • ऋषि राज भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • रूचिका चौधरी महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर
  • सुदेश भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • संजय सिंह राठौर भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
  • सी.एच. श्रीनिवासराव भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली

Abstract

भारतीय कृषि की जटिल चुनौतियों के समाधान हेतु पफसल विविधीकरण को लंबे समय से एक प्रभावी नीति माना गया है। विशेष रूप से धान-गेहूं एकल पफसल प्रणाली के प्रभुत्व ने मृदा उर्वरता में कमी, भूजल स्तर में कमी, पोषक तत्वों की असंतुलनता, कीट एवं रोग प्रकोप तथा पर्यावरणीय तनाव जैसी समस्याओं को जन्म दिया है। दूसरी पीढ़ी की इन चुनौतियों के साथ-साथ खाद्य तेलों की घरेलू आवश्यकता का 50 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर होना स्थिति को और गंभीर बना देता है। वर्तमान में भारत प्रतिवर्ष लगभग 140 लाख टन ;लगभग 1.66 लाख करोड़ रुपये मूल्य काद्ध खाद्य तेल आयात करता है, जो न केवल अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालता है, बल्कि देश को वैश्विक बाजार की मूल्य अस्थिरताओं के प्रति भी संवेदनशील बना देता है। यह परिदृश्य तिलहनी पफसलों को शामिल कर कृषि प्रणाली में विविधता लाने की आवश्यकता और प्रासंगिकता को स्पष्ट करता है, जिससे स्थिरता, लचीलापन और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिलता है। भारतीय कृषि में तिलहन क्षेत्रापफल और उत्पादन की दृष्टि से खाद्यान्नों के बाद दूसरा स्थान रखते हैं। देश में 9 प्रमुख तिलहनी पफसलें-मूंगपफली, तोरिया-सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, रामतिल, अरंडी और अलसी लगभग 26-27 मिलियन हैक्टर क्षेत्रा में उगाई जाती हैं, जो कुल पफसल क्षेत्रा का लगभग 14 प्रतिशत है। ये फसलें न केवल घरेलू उपयोग हेतु खाद्य तेल प्रदान करती हैं, बल्कि पशु आहार के लिए प्रोटीन युक्त खली, पेंट, सौंदर्य प्रसाधन, डिटर्जेंट तथा जैव-ईंधन उद्योगों के लिए भी कच्चा माल उपलब्ध करवाती हैं। इसके साथ ही, ये ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय योगदान देती हैं।

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Published

2026-03-20

How to Cite

सुभाष बाबू, ऋषि राज, रूचिका चौधरी, सुदेश, संजय सिंह राठौर, & सी.एच. श्रीनिवासराव. (2026). फसल विविधीकरण में तिलहनी फसलों की भूमिका. खेती, 78(8), 18-21. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1679