धान-परती प्रणाली में पोषण एवं आजीविका हेतु सतत विविधीकरण
38 / 28Abstract
भारत में धान परती भूमि का क्षेत्रा अत्यंत विशाल है, जो कृषि उत्पादन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपार संभावनाएं समेटे हुए है। वर्तमान में इस भूमि पर नमी की कमी, जलभराव, मृदा उर्वरता में कमी, तकनीकी ज्ञान का अभाव और विपणन से जुड़ी कठिनाइयां प्रमुख चुनौतियों के रूप में सामने हैं। धान की कटाई के बाद भूमि को खाली छोड़ देने से मृदा की उत्पादकता में निरंतर कमी आती है तथा किसानों की आय सीमित रह जाती है। इन समस्याओं के समाधान के रूप में लघु अवधि वाली दलहनी, तिलहनी, सब्जियों एवं चारा फसलों की खेती एक उपयोगी विकल्प सिद्ध हो सकती है। ये फसलें कम समय में तैयार होकर किसानों को अतिरिक्त आय, पोषण एवं मृदा उर्वरता में सुधार का अवसर प्रदान करती हैं। इसके साथ ही, फसल विविधीकरण एवं समेकित कृषि प्रणाली जैसे फसल-पशुपालन-बागवानी-मत्स्य पालन माॅडल भूमि उपयोग दक्षता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने और किसानों की आय दोगुनी करने में सहायक हो सकते हैं। सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाएं, जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना आदि, इन परती भूमि क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
Downloads
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 खेती

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।