परंपरागत खेती से उद्यमिता तक की यात्रा

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Authors

  • अभिषेक प्रताप सिंह Dr. Rajendra Prasad Central Agricultural University

Abstract

मशरूम विटामिन, प्रोटीन, खनिज एवं फोलिक एसिड का एक समृद्ध स्रोत है। यह वसा रहित, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर एवं औषधीय गुणों से युक्त खाद्य पदार्थ है, जिसकी मांग भारत सहित विश्व भर में तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान समय में भारत विश्व के शीर्ष मशरूम उत्पादक देशों में शामिल हो चुका है। वर्ष 2023-24 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में कुल मशरूम उत्पादन लगभग 0.33 मिलियन टन (3.3 लाख मीट्रिक टन) तक पहुँच गया है, जो वर्ष 2019-20 के लगभग 0.24 मिलियन टन की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है।

भारत में उत्पादित मशरूम में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बटन मशरूम का है, जबकि लगभग 15–20 प्रतिशत ऑयस्टर मशरूम, पेडी स्ट्रॉ मशरूम लगभग 7–10 प्रतिशत तथा 3–5 प्रतिशत मिल्की एवं 1–2% अन्य किस्मों का योगदान है। बटन मशरूम वैश्विक स्तर पर भी सर्वाधिक उत्पादित एवं उपभोग की जाने वाली प्रजाति है, जबकि ऑयस्टर मशरूम कम लागत, सरल उत्पादन तकनीक और ग्रामीण क्षेत्रों में उपयुक्तता के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है। पेडी स्ट्रॉ मशरूम जिसे वैज्ञानिक रूप से Volvariella volvacea कहा जाता है, मुख्यतः पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी भारत, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार तथा दक्षिण भारत के आर्द्र एवं गर्म क्षेत्रों में उगाई जाती है मिल्की मशरूम विशेष रूप से गर्म एवं आर्द्र क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। भारत में प्रति व्यक्ति मशरूम खपत अभी भी लगभग 100–150 ग्राम प्रति वर्ष के आसपास है, जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है, अतः इसमें वृद्धि की व्यापक संभावनाएँ हैं।

राज्य स्तर पर देखें तो बिहार देश के अग्रणी मशरूम उत्पादक राज्यों में उभरकर सामने आया है। वर्ष 2024–25 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार लगभग 44,900 मीट्रिक टन (≈12% राष्ट्रीय उत्पादन) मशरुम उत्पादन करता है। इस प्रकार बिहार देश में मशरूम उत्पादन में प्रथम स्थान पर स्थापित हुआ है। राज्य में मुख्य रूप से बटन, ऑयस्टर तथा मिल्की मशरूम की खेती की जाती है।

बिहार में विशेष रूप से ऑयस्टर मशरूम की खेती ग्रामीण युवाओं, महिलाओं एवं स्वयं सहायता समूहों के बीच तेजी से फैल रही है, क्योंकि इसकी उत्पादन लागत कम, तकनीक सरल तथा विपणन की संभावनाएँ अधिक हैं। राज्य सरकार द्वारा मशरूम इकाई स्थापना हेतु 40 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक अनुदान योजनाएँ संचालित की जा रही हैं, जिससे छोटे एवं सीमांत किसान भी इस व्यवसाय को अपनाकर अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

इस प्रकार भारत में बढ़ते उत्पादन, सरकारी समर्थन, तकनीकी उन्नति एवं बाजार मांग के कारण मशरूम खेती एक सशक्त उद्यम के रूप में स्थापित हो रही है। विशेषकर बिहार जैसे राज्य में यह खेती न केवल पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ कर रही है, बल्कि ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण तथा रोजगार सृजन का प्रभावी माध्यम भी बन रही है। मशरूम उत्पादन का यह विस्तार भविष्य में कृषि आधारित उद्यमिता के नए आयाम स्थापित करने की क्षमता रखता है।

कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर द्वारा आईसीएआर-आर्या परियोजना के अन्तर्गत मशरूम उत्पादन को स्वरोजगार के एक सशक्त माध्यम के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्र द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अब तक लगभग 320 से अधिक युवाओं एवं महिलाओं को कम लागत में मशरूम उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकें सिखाई गई हैं। इनमें से कई प्रशिक्षित किसानों ने छोटे-बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू कर अपनी आजीविका का सशक्त माध्यम बनाया है। विशेष रूप से ऑयस्टर मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में केंद्र द्वारा तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग से प्रशिक्षित नवयुवकों ने प्रति चक्र ₹40,000 से ₹60,000 तक की शुद्ध आमदनी प्राप्त की है। यह सफलता न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर रही है, बल्कि अन्य युवाओं को भी जैविक एवं पोषणयुक्त कृषि आधारित उद्यम अपनाने हेतु प्रेरित कर रही है। के.वी.के., माधोपुर निरंतर क्षेत्रीय स्तर पर प्रशिक्षण, प्रदर्शन, स्पॉन वितरण एवं विपणन सहायता प्रदान कर रहा है, जिससे मशरूम उत्पादन को स्थानीय स्तर पर एक लोकप्रिय एवं लाभकारी उद्यम के रूप में स्थापित किया जा सके।  इस सफलता के क्रम मे पश्चिम चम्पारण (बिहार) के प्रगतिशील कृषक श्री उपेन्द्र कुशवाहा ने सीमांत संसाधनों, परंपरागत फसल प्रणाली और अस्थिर आय की परिस्थितियों से उभरकर वैज्ञानिक मशरूम उत्पादन आधारित कृषि उद्यमिता का एक सुदृढ़ एवं पुनरुत्पादनीय (replicable) मॉडल स्थापित किया। तकनीकी प्रशिक्षण, नियंत्रित उत्पादन प्रणाली, संसाधन पुनर्चक्रण तथा बाज़ारोन्मुख रणनीति के माध्यम से उन्होंने न केवल अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन एवं तकनीकी प्रसार का भी प्रभावी कार्य किया। यह मॉडल कृषि अपशिष्ट प्रबंधन एवं जलवायु-अनुकूल की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

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Published

2026-07-16

How to Cite

अभिषेक प्रताप सिंह. (2026). परंपरागत खेती से उद्यमिता तक की यात्रा. खेती, 79(3). https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1783