धान परती भूमि में मेड़ों पर अरहर उत्पादन

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Authors

  • राकेश कुमार भाकृअनुप-पूर्वी क्षेत्रा के लिए अनुसंधान परिसर, पटना, बिहार-800014
  • रघुबर साह बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210
  • देवेन्द्र मंडल बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210
  • संजीव कुमार भाकृअनुप-पूर्वी क्षेत्रा के लिए अनुसंधान परिसर, पटना, बिहार-800014
  • प्रेम कुमार सुंदरम भाकृअनुप-पूर्वी क्षेत्रा के लिए अनुसंधान परिसर, पटना, बिहार-800014

Abstract

अरहर एक महत्वपूर्ण नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली फसल है, जो मृदा की उर्वराशक्ति में वृ(ि करती है। इसकी गहरी जड़ प्रणाली मृदा की निचली परतों से पोषक तत्वों और नमी को ऊपर लाने में सहायक होती है। इस पफसल में प्रोटीन की मात्रा लगभग 20-21 प्रतिशत तक होती है, जिसके कारण यह विश्वभर में प्रोटीन का एक प्रमुख आहार स्रोत मानी जाती है। अरहर लगभग 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तक वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने में सक्षम है। इसका अगली पफसल की उत्पादकता पर सकारात्मक
प्रभाव पड़ता है। पारम्परिक कृषि प्रणालियों में इसे ‘जैविक हल’ और वर्षा आधारित क्षेत्रों में ‘कल्पवृक्ष’ भी कहा जाता है। धान-परती प्रणाली में इसका उपयोग सर्वोत्तम अभ्यास माना जाता है। इसके सभी भाग किसी न किसी रूप में उपयोगी होते हैं। इसके अतिरिक्त, दाने आहार के रूप में, जबकि सूखी शाखाएं ईंधन, छप्पर बनाने तथा टोकरियां तैयार करने में काम आती हैं। धान-परती भूमि में मेड़ों पर अरहर उत्पादन किसानों के लिए कम लागत में अतिरिक्त आय प्राप्त करने का एक प्रभावी विकल्प है। मेड़ों पर अरहर लगाने से मुख्य खेत की नमी संरक्षित रहती है और परती अवधि का बेहतर उपयोग संभव हो पाता है। इसके साथ ही, यह प(ति मृदा संरक्षण, पोषक तत्व प्रबंधन और स्थायी कृषि के लिए अत्यंत लाभकारी सि( होती है।

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Published

2026-03-18

How to Cite

राकेश कुमार, रघुबर साह, देवेन्द्र मंडल, संजीव कुमार, & प्रेम कुमार सुंदरम. (2026). धान परती भूमि में मेड़ों पर अरहर उत्पादन. खेती, 78(9), 17-19. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1817