सतत खेती हेतु संरक्षित जुताई एवं सिंचाई

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Authors

  • ऋचा जसवाल अनुसंधान सहयोगी, मृदा विज्ञान विभाग, सी.एस.केहिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर

Abstract

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कृषि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन शमन एवं खाद्य सुरक्षा का प्रमुख आधार बन गई है। बढ़ती जनसंख्या, घटते जल संसाधन, मृदा क्षरण और बढ़ती लागत के बीच कृषि प्रणालियों की स्थिरता एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में जुताई विधियों, सिंचाई प्रबंधन एवं मृदा गतिकी के अंतर्संबंध को समझकर पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है। जैविक खाद के अभाव में की जाने वाली परंपरागत कृषि मृदा उर्वरता एवं गुणवत्ता को कम करती है और वायुमंडलीय सीओ₂ बढ़ाकर वैश्विक ताप को भी बढ़ाती है। वहीं संरक्षण जुताई, विशेषकर बिना जुताई और अवशेष/भूसा मल्चिंग के साथ, मृदा संरचना, नमी संरक्षण, जैविक कार्बन और जल-स्थिर समूहन में सुधार करती है। उपयुक्त सिंचाई के साथ इसे अपनाने से जड़-मृदा अंतःक्रिया, पोषक तत्व अवशोषण और पफसल सहनशीलता बढ़ती है। प्रारंभिक वर्षों में उपज में हल्की कमी हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह मृदा स्वास्थ्य, जल उत्पादकता और पफसल स्थिरता में सतत वृद्धि सुनिश्चित करती है। जल अभावग्रस्त और वर्षा आधारित क्षेत्रों में यह टिकाऊ और प्रभावी विकल्प है।

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Published

2026-03-20

How to Cite

ऋचा जसवाल. (2026). सतत खेती हेतु संरक्षित जुताई एवं सिंचाई. खेती, 78(11), 9-11. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/1856