श्री अन्न फसलों में रोगों की रोकथाम
46 / 71Abstract
भारत में उगाए जाने वाले श्री अन्न के अंतर्गत मुख्यतः ज्वार, बाजरा, सांवा, कोदो, कुटकी तथा रागी जैसी फसलें शामिल हैं। ये फसलें न केवल पोषक तत्वों
से भरपूर होती हैं, बल्कि पारंपरिक खाद्यान्न गेहूं और धान की तुलना में कई मामलों में अधिक लाभकारी भी मानी जाती हैं। इसी कारण आज इन्हें ‘पोषक अनाज’ के
रूप में विशेष पहचान प्राप्त हो रही है। कई श्री अन्न फसलों में प्रोटीन की मात्रा गेहूं के लगभग समान होती है, जबकि विटामिन बी, लौह, फाॅस्फोरस, कैल्शियम
एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की दृष्टि से ये अधिक समृद्ध होते हैं। श्री अन्न की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जलवायु सहनशीलता है। ये फसलें कम वर्षा, अधिक
तापमान, सूखा तथा अम्लीय भूमि जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, श्री अन्न की फसलें कम लागत में उत्पादन देने
वाली होने के कारण छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए भी लाभकारी हैं। हालांकि, अन्य फसलों की तरह श्री अन्न भी विभिन्न रोगों एवं कीटों से प्रभावित हो सकती
हैं। अतः समय पर पहचान एवं उचित प्रबंधन अपनाकर फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है तथा भविष्य की पोषण एवं खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं की
पूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है।
Downloads
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 खेती

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.
खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।