तिलहन उप-उत्पादों से पोषण और मूल्य संवर्धन

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Authors

  • प्रद्युम्न यादव ICAR-IIOR

Abstract

खल तेल निष्कर्षण के बाद प्राप्त होने वाला एक महत्वपूर्ण कृषि-औद्योगिक उप-उत्पाद है। सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, सरसों, रेपसीड, कपास, अलसी, नारियल, राइस ब्रान तथा रामतिल (नाइजर) की खलें प्रोटीन, आहार रेशा, खनिज, विटामिन तथा जैव-सक्रिय यौगिकों से समृद्ध होती हैं। इनमें लगभग 20–50 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, इसलिए ये पशु एवं मत्स्य आहार के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

तिलहन खलों में फेनोलिक्स, फ्लेवोनॉयड्स, टोकोफेरॉल और लिग्नान जैसे जैव-सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जो इनके एंटीऑक्सीडेंट तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक गुणों में योगदान करते हैं। इनका उपयोग प्रोटीन आइसोलेट, प्रोटीन कॉन्संट्रेट, प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट, आहार रेशा, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, पोषक अनुपूरक, पशु आहार, जैव-उर्वरक तथा जैव-आधारित उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है।

हालांकि, कुछ खलों में फाइटिक अम्ल, टैनिन, ग्लूकोसाइनोलेट, गॉसिपोल तथा ट्रिप्सिन अवरोधक जैसे प्रतिपोषक तत्व पाए जाते हैं, जो उनके पोषण संबंधी उपयोग को सीमित कर सकते हैं। ऊष्मा उपचार, किण्वन, अंकुरण तथा एंजाइम आधारित प्रसंस्करण जैसी तकनीकों द्वारा इन प्रतिपोषक तत्वों की मात्रा को कम किया जा सकता है।

इस प्रकार, तिलहन खलों का समुचित प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन इनके पोषण और आर्थिक महत्व को बढ़ाने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा, किसानों की आय में वृद्धि, संसाधनों के दक्ष उपयोग तथा सतत कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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Published

2026-10-15

How to Cite

प्रद्युम्न यादव. (2026). तिलहन उप-उत्पादों से पोषण और मूल्य संवर्धन. खेती, 79(6), 15-17. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/2271