सांवां की प्राकृतिक खेती

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Authors

  • अर्चना देवी कृषि विज्ञान केन्द्र, कोटवा, आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)
  • प्रीती कुमारी ज्येष्ठ कृषि विपणन निरीक्षक, जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
  • डी.के. द्विवेदी आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (उत्तर प्रदेश)

Abstract

असिंचित क्षेत्रों में बोये जाने वाले श्रीअन्न में सांवां का महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत की एक प्राचीन फसल है। यह सामान्यतः असिंचित क्षेत्रा में बोयी जाने वाली सूखा प्रतिरोधी फसल है। इसमें पानी की आवश्यकता अन्य फसलों से कम है। हल्की नम व उष्ण जलवायु इसके लिए सर्वोत्तम होती है। सामान्यतः सांवां का उपयोग चावल की तरह किया जाता है। उत्तर भारत में सांवां की खीर बड़े चाव से खाई जाती है। इसका हरा चारा पशुओं को बहुत पसंद है। इसमें चावल की तुलना में अधिक पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें पाई जाने वाली प्रोटीन की पाचन शक्ति सबसे अधिक (40 प्रतिशत) होती है।

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Published

2023-08-10

How to Cite

देवी अर्चना, कुमारी प्रीती, & द्विवेदी डी.के. (2023). सांवां की प्राकृतिक खेती. खेती, 76(4), 21-22. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/616